September 27, 2026

“सुशासन के मंच पर फूटा ‘कब्जाराज’ का ज्वालामुखी : कुआँ निगला, जमीन डकारी, अब जनता पूछ रही — शासन सो रहा या संरक्षण दे रहा?”

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सारंगढ़ बिलाईगढ़ भीखमपुर/गोबरसिंहा।सुशासन तिहार के पंडाल में इस बार सिर्फ योजनाओं की प्रशंसा नहीं गूंजी, बल्कि सरकारी जमीन पर पसरे कथित “कब्जाराज” के खिलाफ जनता का दर्द भी दहाड़ बनकर निकला। ग्राम पंचायत गोबरसिंहा से पहुंचे शिकायतकर्ता अजय कुमार साहू ने ऐसा आवेदन सौंपा, जिसने प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी है। आवेदन के शब्द सिर्फ स्याही नहीं थे, बल्कि वर्षों से दबे ग्रामीण आक्रोश की अंगार भरी आवाज थे।

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कहा जाता है —
“जहाँ रक्षक मौन हो जाएँ, वहाँ भक्षक सिंहासन पर बैठ जाते हैं।”
गोबरसिंहा की कहानी भी कुछ ऐसी ही दिखाई दे रही है।

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ग्रामीणों का आरोप है कि सार्वजनिक उपयोग का कुआँ, जो कभी गांव की प्यास बुझाता था, आज अतिक्रमण की धूल में दफन हो चुका है। शासकीय भूमि, जो जनता की धरोहर थी, अब कथित रूप से कुछ रसूखदारों की निजी जागीर बनती जा रही है। कहीं हार्वेस्टर गरज रहे हैं, कहीं जेसीबी की गर्जना सुनाई दे रही है, तो कहीं सरकारी जमीन पर मकान और व्यावसायिक गतिविधियाँ खुलेआम फल-फूल रही हैं।

यह दृश्य मानो लोकतंत्र के चेहरे पर व्यंग्य कर रहा हो —
“जनता की जमीन पर जनता ही बेगानी!”

आवेदन में जिन नामों का उल्लेख किया गया है, उन पर आरोप है कि उन्होंने सरकारी भूमि को इस प्रकार घेर लिया मानो शासन ने रजिस्ट्री उनके नाम कर दी हो। कोई भारी मशीनों का अड्डा चला रहा है, कोई दूध सोसायटी संचालित कर रहा है, तो कोई मकान निर्माण कर शासकीय जमीन को निजी साम्राज्य में बदलने में जुटा है।

शिकायत में सबसे गंभीर आरोप प्रशासनिक निष्क्रियता पर लगाया गया है। ग्रामीणों का कहना है कि पहले भी शिकायत हुई, जांच हुई, नोटिस जारी हुए, मगर कार्रवाई फाइलों की कब्र में दफन हो गई।
यही कारण है कि गांव में अब यह कहावत तैर रही है —
“नोटिस निकला शेर बनकर, कार्रवाई लौटी ढेर बनकर।”

सुशासन तिहार में जब यह आवेदन सौंपा गया, तब लोगों की निगाहें मंच पर कम और प्रशासन के चेहरे पर ज्यादा थीं। क्योंकि सवाल सिर्फ कब्जे का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जो कथित रूप से सब कुछ देखकर भी मौन बैठी रही।

यदि आरोप सही हैं, तो यह मामला सिर्फ अतिक्रमण नहीं बल्कि सरकारी संपत्ति पर योजनाबद्ध हमला माना जाएगा। सार्वजनिक कुएं को पाटना केवल मिट्टी डालना नहीं, बल्कि गांव की सामूहिक स्मृति और अधिकारों को दफन करना है। सरकारी भूमि पर निजी कारोबार चलाना केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि शासन की गरिमा को चुनौती देना है।

खबर यह भी है कि पूर्व में तहसील स्तर पर बेदखली की प्रक्रिया शुरू हुई थी, मगर राजनीतिक दबाव और रसूख की दीवारों में प्रशासनिक बुलडोजर की धार कुंद पड़ गई। ग्रामीण अब खुलकर कह रहे हैं कि —
“यदि गरीब झोपड़ी बढ़ाए तो अतिक्रमण, और रसूखदार सरकारी जमीन निगल जाए तो व्यवस्थागत चुप्पी!”

व्यंग्य यह भी है कि सुशासन तिहार में जनता शासन से न्याय मांग रही है, जबकि दूसरी ओर सरकारी जमीन स्वयं न्याय की भीख मांगती दिखाई दे रही है।

शिकायतकर्ता ने मांग की है कि मामले की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच हो, अवैध कब्जे हटाए जाएँ, सार्वजनिक कुएं को पूर्व स्थिति में बहाल किया जाए तथा कार्रवाई दबाने वाले अधिकारियों की भूमिका की भी जांच हो।

ग्रामीणों का दर्द अब शब्दों से आगे निकल चुका है। गांव में चर्चा है कि यदि अब भी कार्रवाई नहीं हुई तो आने वाले समय में सरकारी भूमि का नामोनिशान मिट जाएगा। जनता पूछ रही है —
“क्या सरकारी जमीन सिर्फ कागजों में बची रहेगी?”

इस पूरे मामले ने प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर कई तीखे प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। आखिर नोटिस के बाद कार्रवाई क्यों नहीं हुई? किसके दबाव में सरकारी जमीन पर कब्जे फलते रहे? सार्वजनिक कुएं को बचाने की जिम्मेदारी किसकी थी?

सुशासन तिहार में उठी यह शिकायत अब केवल एक आवेदन नहीं रही, बल्कि यह उस व्यवस्था के खिलाफ जनता का आरोपपत्र बन चुकी है, जहाँ कथित रूप से रसूख के आगे नियम घुटने टेकते नजर आते हैं।

अब देखना यह होगा कि प्रशासन इस शिकायत को भी अन्य फाइलों की तरह धूल चटवाता है या फिर सचमुच बुलडोजर न्याय की राह पकड़ता है। क्योंकि जनता अब चेतावनी के स्वर में कह रही है —

“सरकारी जमीन पर कब्जा करने वाले चाहे कितने भी प्रभावशाली हों, जनता की चुप्पी जब टूटती है तो सिंहासन तक हिल जाते हैं।”

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