“RTI की मशाल लेकर निकले सरपंच, और खुद के घर में जलती रही ‘वेंडर व्यवस्था’ की लौ”
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जिला रायगढ़/ग्राम पंचायत एकताल की कहानी कुछ ऐसी है, जिसे सुनकर “चिराग तले अंधेरा” वाली कहावत भी शर्मा जाए। यहां पूर्व सरपंच श्रीमती बुद्धेश्वरी ने अपने ही घर के आंगन को विकास कार्यों का ठेका केंद्र बना दिया—जहां वेंडर कोई बाहर का ठेकेदार नहीं, बल्कि खुद के पति श्री हिमांशु चौहान निकले। अब इसे पारिवारिक समर्पण कहें या योजनाबद्ध आर्थिक प्रबंधन, यह समझना थोड़ा मुश्किल जरूर है,
लेकिन मामला साफ है—राशियों का आहरण हुआ और रिश्तों का उपयोग भी।
मजेदार बात यह है कि जिन सरपंच महोदय के घर में यह “घरेलू वेंडर मॉडल” इतनी खूबसूरती से चल रहा था, वही आज वर्तमान में सरपंच पद पर आसीन हैं और साथ ही सरपंच संघ, रायगढ़ जिला के जिला अध्यक्ष भी हैं। यानी नेतृत्व भी, मार्गदर्शन भी और उदाहरण भी—सब कुछ एक ही पैकेज में।
अब जरा उस घटना पर नजर डालिए, जब कुछ महीने पहले यही सरपंच संघ के जिला अध्यक्ष और ब्लॉक स्तर के अन्य अध्यक्षगण बड़े जोश के साथ रायगढ़ SP कार्यालय पहुंचे थे। हाथों में सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के आवेदन, चेहरे पर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई का संकल्प और आवाज में “पारदर्शिता” का दम—पूरा माहौल किसी आंदोलन से कम नहीं था। पत्रकारों के माध्यम से RTI लगाकर अवैध वसूली की शिकायत की गई, मानो भ्रष्टाचार के खिलाफ जंग का बिगुल बज चुका हो।
लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि जब खुद के घर में ही “वेंडर साहब” बैठे हों, और पंचायती राज की राशि उसी दिशा में बह रही हो, तब यह RTI की लड़ाई किसके खिलाफ थी? क्या यह वही स्थिति नहीं है, जहां शिकारी खुद ही जंगल बचाने की बात करता है?
पंचायती राज अधिनियम 1993 की धारा 92 साफ तौर पर यह कहती है कि पद का दुरुपयोग कर अपने रिश्तेदारों को लाभ पहुंचाना नियमों का उल्लंघन है। लेकिन यहां तो नियमों को शायद “सुझाव” समझ लिया गया और रिश्तों को “प्राथमिकता”। विकास कार्यों के नाम पर जो राशि आई, वह जनता की थी, लेकिन रास्ता सीधे परिवार तक पहुंच गया।
व्यंग्य की बात तो यह है कि एक तरफ मंच से भ्रष्टाचार के खिलाफ भाषण दिए जाते हैं, दूसरी तरफ उसी मंच के पीछे “व्यवस्था” चुपचाप चलती रहती है।

जैसे कोई कहे—“हम भ्रष्टाचार के सख्त खिलाफ हैं, बस अपने हिस्से का छोड़कर।”
ग्राम पंचायत एकताल की यह कहानी सिर्फ एक पंचायत की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की झलक है, जहां सत्ता को सेवा नहीं बल्कि सुविधा समझ लिया जाता है। यहां नियमों की किताब अलमारी में सजी रहती है, और व्यवहार में “जुगाड़” का संविधान लागू होता है।
अब जनता भी समझदार है। वह देख रही है कि कौन RTI के नाम पर आवाज उठा रहा है और कौन उसी RTI के दायरे में खुद खड़ा है। सवाल सिर्फ इतना है कि क्या यह दोहरा चरित्र यूं ही चलता रहेगा, या फिर कभी सच्चे अर्थों में पारदर्शिता की शुरुआत होगी?
अंत में बस इतना कहना उचित होगा—
“जब चौकीदार ही तिजोरी का हिसाब रखने लगे,
तो चोरी पकड़ना थोड़ा मुश्किल हो जाता है।”
ग्राम पंचायत एकताल की यह कहानी भी कुछ ऐसी ही है, जहां लड़ाई भ्रष्टाचार से कम और “अपनों के संरक्षण” से ज्यादा लगती है। अब देखना यह है कि कानून की नजर कब इस व्यंग्य को गंभीरता से लेती है, और कब ‘वेंडर व्यवस्था’ सच में व्यवस्था के दायरे में आती है।
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