डोलोमाइट की दौड़ में ब्रेक: ट्रैक्टरों की ‘तेज रफ्तार सेवा’ आखिर थाने पहुंच ही गई!”
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सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिला – 03/04/2026 बरमकेला ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले ग्राम पंचायत कटगपाली और बोंदा में इन दिनों विकास की एक अनोखी परिभाषा देखने को मिल रही थी—जहां सड़कें भले अधूरी हों, लेकिन ट्रैक्टरों की रफ्तार किसी एक्सप्रेसवे से कम नहीं थी। फर्क बस इतना था कि ये ट्रैक्टर आम जनता की सेवा में नहीं, बल्कि धरती माता के सीने से डोलोमाइट पत्थर निकालकर “प्राइवेट विकास” को गति देने में लगे हुए थे।
सूत्रों के अनुसार, इन खदानों से अवैध रूप से डोलोमाइट पत्थरों की निकासी का कार्य इतने व्यवस्थित ढंग से चल रहा था कि मानो कोई सरकारी योजना हो—बस टेंडर और फाइलों की औपचारिकता की कमी थी। ट्रैक्टर दिन-रात अपनी “ड्यूटी” निभाते हुए पत्थरों को खदान से क्रेशर तक पहुंचाने में जुटे थे। ऐसा लग रहा था मानो ये ट्रैक्टर नहीं, बल्कि “खनिज सेवा एक्सप्रेस” हो, जिसकी कोई टाइमिंग नहीं, कोई रोक-टोक नहीं।
लेकिन कहते हैं ना, हर फिल्म में इंटरवल आता है—और यहां इंटरवल का जिम्मा संभाला सरिया तहसीलदार और थाना प्रभारी (TI) ने। इस बार कहानी में ट्विस्ट तब आया जब लगभग 10 से 12 ट्रैक्टरों को उनके “गंतव्य” यानी क्रेशर तक पहुंचने से पहले ही रोक लिया गया। दोनों विभागों की संयुक्त कार्रवाई ने इन ट्रैक्टरों की रफ्तार पर ऐसा ब्रेक लगाया कि सीधा रास्ता बदलकर थाने की ओर मुड़ गया।
अब स्थिति यह है कि जो ट्रैक्टर कुछ देर पहले तक खुद को “खनन उद्योग के सुपरस्टार” समझ रहे थे, वे थाने में खड़े होकर अपनी किस्मत पर विचार कर रहे हैं। ड्राइवरों के चेहरे पर वही भाव है जो परीक्षा में नकल करते पकड़े गए छात्र का होता है—“सर, पहली बार हुआ है!”
गांव के लोगों के बीच भी इस कार्रवाई को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है। कुछ लोग इसे प्रशासन की सख्ती बता रहे हैं, तो कुछ इसे “एक दिन की बारिश” कहकर अगले दिन फिर वही धूप लौटने की आशंका जता रहे हैं। क्योंकि स्थानीय स्तर पर यह कोई पहली घटना नहीं है—अवैध खनन का यह खेल लंबे समय से “ओपन सीक्रेट” बना हुआ है।
व्यंग्य यह भी है कि जब तक ट्रैक्टर सड़कों को तोड़ते हुए दौड़ते रहे, तब तक सब कुछ सामान्य था। लेकिन जैसे ही वे थाने पहुंचे, अचानक कानून और नियमों की किताबें खुल गईं। ऐसा प्रतीत होता है कि नियम भी मौके का इंतजार करते हैं—जब पकड़ हो, तभी लागू हों।
अब बड़ा सवाल यही है कि आगे क्या कार्रवाई होती है? क्या यह सिर्फ एक औपचारिक “डेमो” है, जिसमें कुछ ट्रैक्टर पकड़े जाएंगे, कागजी कार्यवाही होगी और फिर सब कुछ पहले जैसा चलता रहेगा? या फिर यह वास्तव में अवैध खनन के खिलाफ कोई ठोस कदम साबित होगा?
फिलहाल तो ट्रैक्टरों की “तेज सेवा” पर विराम लग गया है और प्रशासन ने अपनी मौजूदगी दर्ज करा दी है। लेकिन देखना यह होगा कि यह कार्रवाई एक स्थायी बदलाव लाती है या फिर कुछ दिनों बाद वही ट्रैक्टर फिर से “डोलोमाइट डिलीवरी” के मिशन पर निकल पड़ेंगे।
क्योंकि इस क्षेत्र में एक कहावत अब आम हो चुकी है—
“खनन बंद नहीं होता, बस थोड़ी देर के लिए ‘आराम’ पर चला जाता है।”
अब जनता की निगाहें प्रशासन पर टिकी हैं—क्या यह सख्ती जारी रहेगी या फिर यह खबर भी बाकी खबरों की तरह कुछ दिनों में फाइलों में दबकर रह जाएगी।
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