“सरकारी जमीन पर कब्जा, कार्रवाई में देरी: क्या रसूखदारों को मिला संरक्षण?”
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सारंगढ़ बिलाईगढ़ बरमकेला/ के सरिया तहसील अंतर्गत ग्राम गोबरसिंघा में सरकारी भूमि पर अतिक्रमण का मामला अब प्रशासनिक कार्यप्रणाली और प्रभावशाली लोगों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है। तहसीलदार न्यायालय सरिया द्वारा जारी चार अलग-अलग आदेशों में साफ तौर पर उल्लेख किया गया है कि ग्राम गोबरसिंघा के कुछ लोगों द्वारा शासकीय भूमि पर मकान बनाकर अवैध कब्जा किया गया है। इसके बावजूद लंबे समय तक कब्जा नहीं हटना प्रशासन और स्थानीय तंत्र की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है।

तहसील न्यायालय सरिया द्वारा जारी राजस्व प्रकरण क्रमांक 202403320800018, 019, 020 एवं 021 में अलग-अलग व्यक्तियों — हेतराम, सीताराम, लक्ष्मीनारायण और बलराम — के खिलाफ कार्रवाई का आदेश पारित किया गया है। आदेश में उल्लेख है कि संबंधित लोगों ने ग्राम गोबरसिंघा के खसरा नंबर 666 की शासकीय भूमि पर मकान निर्माण कर अतिक्रमण किया है। न्यायालय ने 29 मई 2024 को ही बेदखली का आदेश पारित कर दिया था, लेकिन आदेश के कई महीनों बाद तक अवैध कब्जा नहीं हटाया गया।
अब 26 सितंबर 2025 को पुनः नोटिस जारी कर तीन दिनों के भीतर अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए गए हैं। आदेश में स्पष्ट चेतावनी दी गई है कि यदि तय समय सीमा तक कब्जा नहीं हटाया गया तो राजस्व अमला पुलिस बल की उपस्थिति में बलपूर्वक बेदखली की कार्रवाई करेगा और इसके लिए संबंधित व्यक्ति स्वयं जिम्मेदार होंगे।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मई 2024 में ही आदेश पारित हो चुका था, तो फिर कार्रवाई में इतनी देरी क्यों हुई? आखिर कौन लोग थे जिनके प्रभाव के चलते प्रशासनिक आदेश केवल कागजों तक सीमित रहे? ग्रामीणों का आरोप है कि गांव में कुछ रसूखदार लोगों और स्थानीय प्रभावशाली व्यक्तियों के कारण प्रशासन कठोर कार्रवाई करने से बचता रहा। यही कारण है कि बार-बार नोटिस जारी होने के बावजूद अतिक्रमण जस का तस बना रहा।
गांव के लोगों का कहना है कि यदि यही अतिक्रमण किसी गरीब या कमजोर वर्ग के व्यक्ति द्वारा किया गया होता, तो प्रशासन तत्काल बुलडोजर चलाकर कार्रवाई कर देता। लेकिन यहां मामला प्रभावशाली लोगों से जुड़ा होने के कारण लंबे समय तक फाइलें दबाकर रखी गईं। इससे प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल उठ रहे हैं।
दस्तावेजों में यह भी उल्लेख किया गया है कि थाना प्रभारी सरिया को पुलिस बल उपलब्ध कराने तथा राजस्व निरीक्षक एवं पटवारी को कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके बावजूद कार्रवाई का लंबा इंतजार यह संकेत देता है कि कहीं न कहीं प्रशासनिक इच्छाशक्ति की कमी रही है। ग्रामीणों के बीच यह चर्चा भी तेज है कि क्या कुछ अधिकारियों ने दबाव में आकर कार्रवाई को टालने का प्रयास किया?
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में शासकीय भूमि पर अतिक्रमण के मामलों को लेकर सरकार लगातार सख्ती की बात करती रही है। मुख्यमंत्री से लेकर जिला प्रशासन तक सार्वजनिक मंचों से अवैध कब्जों पर कार्रवाई की बातें करते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर कई मामलों में आदेश होने के बावजूद कार्रवाई वर्षों तक लंबित रहती है। गोबरसिंघा का मामला भी अब उसी श्रेणी में देखा जा रहा है।
ग्रामीणों ने मांग की है कि केवल कब्जा हटाने तक ही कार्रवाई सीमित न रहे, बल्कि यह भी जांच हो कि आखिर इतने लंबे समय तक आदेशों का पालन क्यों नहीं कराया गया। यदि किसी अधिकारी की लापरवाही या मिलीभगत सामने आती है, तो उसके खिलाफ भी सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
अब देखना होगा कि प्रशासन इस बार वास्तव में सरकारी जमीन को अतिक्रमण मुक्त कर पाता है या फिर यह मामला भी केवल नोटिस और चेतावनी तक सीमित रह जाएगा। फिलहाल गोबरसिंघा में जारी इन आदेशों ने प्रशासनिक व्यवस्था और रसूखदारों के गठजोड़ पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है।
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