September 27, 2026

जांच की फाइल में दफन सच, कुर्सियों पर बैठा भ्रष्टाचार — बरमकेला में प्रशासनिक मिलीभगत की खुली पोल

1 min read
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.55.12
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.55.14
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.55.13
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.55.14 (1)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.55.13
Spread the love


जिला सारंगढ़ बिलाईगढ़ – बरमकेला क्षेत्र में लोकतंत्र की सबसे मजबूत कड़ी—प्रशासन—आज खुद कटघरे में खड़ा दिखाई दे रहा है। जिस जांच प्रतिवेदन से सच सामने आना था, वही प्रतिवेदन “निराधार” करार देकर न सिर्फ तथ्यों की हत्या की गई, बल्कि अपने से उच्च स्तर पर बैठी एसडीएम को भी गुमराह कर दिया गया। सवाल यह नहीं कि गलती हुई या चूक रह गई; सवाल यह है कि क्या यह सब जानबूझकर किया गया—ताकि भ्रष्टाचार की जड़ें और गहरी हों?
सीईओ स्तर पर तैयार की गई जांच रिपोर्ट, जिसमें सहजपाली के सत्या इजारदार पदेन सरपंच पर लगे आरोपों की वास्तविकता की परतें खुलनी थीं, उसे कागज़ों में ही दफना दिया गया। रिपोर्ट को “निराधार” बताकर प्रशासनिक भाषा में एक ऐसा पर्दा डाल दिया गया, जिसके पीछे सच्चाई दम तोड़ती रही। हैरानी की बात यह है कि एसडीएम मैडम ने भी बिना समुचित अवलोकन, बिना दस्तावेज़ी परीक्षण और बिना स्थल निरीक्षण के धारा 40(ग़) को निराधार मान लिया। क्या यही न्याय है? क्या यही प्रशासनिक निष्पक्षता?
धारा 40(ग़) कोई औपचारिक मुहर नहीं, बल्कि जनहित की सुरक्षा का औज़ार है। इसे यूँ ही खारिज कर देना, उस औज़ार को कुंद करना है—जो भ्रष्टाचार पर वार करने के लिए बना था। सवाल उठता है कि क्या अफसरशाही की आँखों पर सुविधा की पट्टी बंधी थी, या तिजोरी की चमक ने विवेक को अंधा कर दिया? जब जांच बिना अवलोकन के निपटा दी जाए, तो संदेश साफ जाता है—गलत करने वालों के लिए रास्ते खुले हैं।
यह मामला केवल एक सरपंच या एक पंचायत का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की साख का है। अगर जांच रिपोर्टें यूँ ही “निराधार” ठहराई जाती रहीं, तो ईमानदार शिकायतकर्ता हतोत्साहित होंगे और भ्रष्ट तत्व बेखौफ। आज एक फाइल दबाई गई है, कल कई योजनाएँ दबेंगी; आज एक आरोप खारिज हुआ है, कल कई घोटाले जन्म लेंगे।
प्रशासनिक कुर्सियों पर बैठकर यदि अधिकारी “देखे बिना” निर्णय लेने लगें, तो यह चूक नहीं—सहमति की राजनीति कहलाएगी। सहमति उस भ्रष्टाचार से, जो नीचे पनपता है; सहमति उस तंत्र से, जो सवाल पूछने वालों को चुप कराता है। क्या यही कारण है कि जांच में न तो लेखा-जोखा खंगाला गया, न कार्यों की भौतिक सत्यापन हुआ, और न ही शिकायतकर्ताओं की बात सुनी गई?
कलमकार का दायित्व सिर्फ खबर लिखना नहीं, सत्ता से सवाल करना है। और आज सवाल यह है—क्या बरमकेला में जांच सिर्फ कागज़ी रस्म बन चुकी है? क्या तिजोरियाँ भरने की होड़ में जनता के हक़ गिरवी रख दिए गए हैं? अगर जवाब “नहीं” है, तो फिर स्वतंत्र, निष्पक्ष और पारदर्शी पुनःजांच से डर क्यों?
यह “तबाही खबर” इसलिए है क्योंकि जब जांच मरती है, तो भरोसा मरता है; और जब भरोसा मरता है, तो लोकतंत्र घायल होता है। समय आ गया है कि उच्च स्तर पर बैठे अधिकारी खुद आगे बढ़कर इस पूरे मामले की स्वतंत्र समीक्षा, स्थल निरीक्षण, और दस्तावेज़ी ऑडिट कराएं। दोषी चाहे किसी भी कुर्सी पर बैठा हो—उसे बख्शा न जाए।
क्योंकि अगर आज कलम चुप रही, तो कल भ्रष्टाचार बोलेगा। और जब भ्रष्टाचार बोलता है—तो जनता की आवाज़ दब जाती है।

WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.55.12 (2)
WhatsApp Image 2026-08-14 at 23.55.12 (1)
WhatsApp Image 2026-08-15 at 07.47.34
WhatsApp Image 2026-08-15 at 07.47.34 (1)

Loading

More Stories

RECENT POSTS

error: Content is protected !!