February 10, 2026

बरमकेला ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले गांव में अवैध शराब का तांडव: किसके सहारे फल-फूल रहा है ज़हर का कारोबार?

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जिला सारंगढ़ बिलाईगढ़ बरमकेला ब्लॉक के अंतर्गत आने वाले कई गांव आज अवैध महुआ शराब और देशी मदिरा के अवैध कारोबार की गिरफ्त में हैं। हालात ऐसे बन चुके हैं कि सरकारी नियम-कायदों को ठेंगा दिखाते हुए खुलेआम शराब खरीदी जा रही है, फिर उसे चोरी-छिपे ग्रामीण इलाकों में दोगुने-तिगुने दामों पर बेचा जा रहा है। यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि पूरे समाज के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि यह अवैध कारोबार किसी अंधेरे कोने में नहीं, बल्कि देशी मदिरा दुकानों की छाया में फल-फूल रहा है। सवाल सीधा है—जब शराब दुकानों से तय मात्रा और तय नियमों के अनुसार बिक्री होनी चाहिए, तो फिर इतनी बड़ी मात्रा में शराब गांवों तक कैसे पहुंच रही है? क्या दुकानदारों की आंखें बंद हैं या फिर सब कुछ जानते-बूझते हुए यह खेल खेला जा रहा है?
ग्रामीणों का आरोप है कि शराब दुकानों के विक्रेता ही गांव-गांव घूमने वाले कोचियों (अवैध विक्रेताओं) को आधार दे रहे हैं। न रजिस्टर की सीमा, न समय की पाबंदी—बस पैसा दो और शराब उठाओ। यही शराब बाद में गांवों में छिपाकर बेची जाती है, जहां न उम्र की जांच होती है, न नशे के दुष्परिणामों की चिंता।
यहां सवाल सिर्फ अवैध बिक्री का नहीं है, सवाल है प्रशासनिक चुप्पी का। आबकारी विभाग आखिर कर क्या रहा है? क्या विभाग को इन गतिविधियों की भनक नहीं है, या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गई हैं? ग्रामीणों का कहना है कि कई बार शिकायतें की गईं, लेकिन नतीजा सिफर रहा। कभी-कभार औपचारिक कार्रवाई दिखा दी जाती है—दो-चार बोतलें जब्त, छोटा सा जुर्माना और फिर वही खेल शुरू।
अवैध महुआ शराब का असर अब साफ दिखने लगा है। गांवों में घरेलू हिंसा बढ़ रही है, मजदूरी की कमाई शराब में उड़ रही है, युवा नशे की गिरफ्त में फंसते जा रहे हैं। स्कूल जाने की उम्र के बच्चे शराबियों के झगड़े देखने को मजबूर हैं। यह सिर्फ कानून व्यवस्था की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक आपदा बनती जा रही है।
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि यह सब बिना किसी राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण के संभव नहीं। सवाल उठता है—क्या किसी सफेदपोश का हाथ इस काले कारोबार के सिर पर है? क्या आबकारी विभाग की जिम्मेदारी सिर्फ कागजों में रह गई है? अगर नहीं, तो अब तक ठोस कार्रवाई क्यों नहीं?
ग्रामीणों की मांग है कि देशी मदिरा दुकानों की स्टॉक और बिक्री की उच्चस्तरीय जांच हो, कोचियों को सप्लाई देने वाले दुकानदारों पर सख्त कार्रवाई की जाए और आबकारी विभाग की निष्क्रियता की भी जांच हो। सिर्फ छोटे विक्रेताओं को पकड़कर फोटो खिंचवाना समाधान नहीं है—जब तक जड़ पर वार नहीं होगा, तब तक यह ज़हर यूं ही फैलता रहेगा।
अब सवाल यह है कि प्रशासन कब जागेगा? क्या किसी बड़े हादसे के बाद ही कार्रवाई होगी? या फिर बरमकेला ब्लॉक के गांवों को नशे की आग में झोंक कर जिम्मेदार अधिकारी चैन की नींद सोते रहेंगे?
जनता जवाब चाहती है।
क्योंकि यह सिर्फ शराब की कहानी नहीं—यह सिस्टम की नाकामी की कहानी है।

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