September 27, 2026

ग्राम पंचायत गोबरसिंहा का ‘विकास मॉडल’—खंडहर शौचालय बना जंगल सफारी का नया हॉटस्पॉट!”

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सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले के ग्राम पंचायत गोबरसिंहा का शौचालय इन दिनों चर्चा में है। कारण—इसका उपयोग नहीं, बल्कि इसका अस्तित्व। कभी स्वच्छ भारत अभियान के गर्व से खड़े किए गए ये शौचालय आज खंडहर बनकर गांव की पहचान पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर रहे हैं। दीवारों पर चित्र तो अब भी ‘स्वच्छता का संदेश’ दे रहे हैं, पर हालत देखकर लगता है यह संदेश अब खुद को ही समझा रहे हैं—क्योंकि सुनने वाला कोई बचा ही नहीं।

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सबसे पहले तो इन शौचालयों की ‘बॉडी लैंग्वेज’ देखिए—दीवारों की पपड़ी ऐसे झड़ रही है जैसे कोई सरकारी योजना की फाइल को दीमक चाट रही हो। छत से जड़ें लटक रही हैं, मानो पेड़-पौधे भी सोच रहे हों कि “चलो भाई, सरकार नहीं संभाल सकी तो हम ही इसे संभाल लेते हैं।” अंदर का नज़ारा ऐसा कि आप जाएँ तो लगे जैसे किसी हॉरर मूवी की शूटिंग स्पॉट पर पहुंच गए हों—फर्क बस इतना कि फिल्म में लाइट होती है, यहां अंधेरा ही अंधेरा।

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महिला और पुरुष के लिए अलग-अलग बने ये कमरे आज बिना किसी भेदभाव के समान रूप से खंडहर हैं। यहां बराबरी की मिसाल देखते ही बनती है। पंचायत यदि चाहे तो इस जगह को “Gender Equality Heritage Site” घोषित कर सकती है। वैसे भी, सरकारी भवनों का खस्ताहाल होना नई बात नहीं, लेकिन इतना ‘क्रिएटिव खस्ताहाल’ कम ही देखने मिलता है।

दीवार पर जो चित्रकारी बनी है, वह भी कमाल की विडंबना पेश करती है। एक तरफ महिला सफाई और कचरा पेटी का प्रचार करती दिखाई देती है, दूसरी तरफ शौचालय की असल हालत यह साबित करती है कि “कागज़ पर विकास” और “जमीन पर विकास” में कितना अंतर होता है। कचरा पेटी की जगह यहां कचरा पहाड़ दिखाई देता है, जिसे देखकर कचरा तक शर्मिंदा हो जाए कि इसे फेंका भी गया तो कहा गया।

सबसे बड़ा सवाल है—क्या यह शौचालय कभी उपयोग हुआ भी था? यदि हुआ भी होगा तो शायद पहले सप्ताह तक, जब तस्वीरें खिंचवाकर ‘सफलता’ ऊपर भेजनी थी। उसके बाद हालात ने ऐसी करवट बदली कि शौचालय खुद भी सोच में पड़ गया होगा—“मेरा कर्तव्य क्या है? उपयोग होना या यूँ ही खड़े-खड़े बूढ़ा होना?”

ग्राम पंचायत की ओर से इस पर कोई ध्यान न दिया जाना भी एक कला है। आखिर इतनी अनदेखी करना भी तो आसान नहीं! न मरम्मत, न सफाई, न देखरेख। केवल खंडहर छोड़ देना—जैसे किसी ने कह दिया हो कि “इसे समय के हवाले कर दो, यह खुद ही अपने भविष्य का निर्णय करेगा।”

अंत में बस इतना ही कहा जा सकता है—

गोबरसिंहा का यह शौचालय अब भवन नहीं, बल्कि ‘संदेश’ बन चुका है—
कि योजनाएँ जितनी तेजी से बनती हैं,
उतनी ही तेजी से जर्जर भी हो जाती हैं,
अगर देखभाल की जिम्मेदारी किसी को याद ही न रहे।

शायद आने वाले समय में इस खंडहर को देखकर ही कोई अधिकारी बोले—
“इस गांव का विकास हम करेंगे… बस अगले निरीक्षण के बाद!”

खबर,1…………………..2 Commingsoon

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