September 26, 2026

सहजपाली पंचायत में ‘धारा-40(ग)’ का खेल? शिकायत सही फिर भी सरपंच बेदाग, फैसले पर उठे सवाल

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जिला सारंगढ़ बिलाईगढ़ बरमकेला/सहजपाली। ग्राम पंचायत सहजपाली में धारा-40(ग) की कार्रवाई को लेकर ऐसा घटनाक्रम सामने आया है, जिसने पूरे पंचायत तंत्र की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकायतकर्ता अजय कुमार साहू द्वारा पिछले कार्यकाल के कथित अनियमितताओं पर की गई लिखित शिकायत में जनपद पंचायत स्तर पर जांच टीम गठित हुई और शुरुआती जांच में आरोपों को सही पाया गया। लेकिन आगे की प्रशासनिक प्रक्रिया और अंतिम निर्णय ने पूरे मामले को उलझा दिया है, जिससे अब “सच दबा या दबाया गया?” जैसे सवाल गांव-गांव में चर्चा का विषय बन चुके हैं।
मामला ग्राम पंचायत सहजपाली के वर्तमान सरपंच सत्या घनश्याम इजारदार से जुड़ा है, जो पूर्व में भी सरपंच रह चुके हैं। शिकायतकर्ता ने बरमकेला जनपद पंचायत में धारा-40(ग) के तहत लिखित शिकायत प्रस्तुत कर वित्तीय अनियमितताओं और पद के दुरुपयोग का आरोप लगाया था।

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जनपद सीईओ द्वारा गठित जांच टीम ने प्रारंभिक जांच में आरोपों को सही पाया,

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जिसके बाद मामला गंभीर माना गया। सूत्रों के अनुसार, जनपद सीईओ ने धारा-92 का हवाला देते हुए एसडीएम कार्यालय को पत्र जारी किया और आगे की कार्रवाई के लिए मामला अनुविभागीय दंडाधिकारी के समक्ष भेजा गया।
इसी बीच आरोप है कि सरपंच पक्ष द्वारा “रिकवरी भर देने” और “पैसे का मामला मामूली” बताकर मामले को हल्का दिखाने की कोशिश की गई। कथित तौर पर लगभग 1,82,000 रुपये की राशि को लेकर यह तर्क दिया गया कि “इतनी रकम ही तो है” और रिकवरी कर दी गई है। लेकिन प्रशासनिक प्रक्रिया यहीं नहीं रुकी। एसडीएम कार्यालय से नोटिस जारी हुआ कि धारा-40(ग) के तहत सरपंच को पद से मुक्त क्यों न किया जाए। इस नोटिस के बाद सरपंच पक्ष ने वकील के माध्यम से समय लिया और मामला लंबा खिंच गया।
सबसे बड़ा मोड़ तब आया जब एसडीएम द्वारा पुनः जांच के आदेश दिए गए। 

पुनः जांच के दौरान कोविड-काल का हवाला देते हुए कई बिंदुओं को हल्का बताया गया और दूसरी जांच रिपोर्ट में पहले की तुलना में जमीन-आसमान का अंतर दिखाई दिया। पहली रिपोर्ट जहां आरोपों को सही ठहराती थी, वहीं दूसरी रिपोर्ट ने सरपंच को राहत दे दी। आखिरकार अनुविभागीय दंडाधिकारी द्वारा सरपंच सत्या घनश्याम इजारदार को आरोपों से निराधार घोषित कर दिया गया और पद से हटाने की कार्रवाई नहीं हुई।
लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होते हैं।
शिकायतकर्ता का कहना है कि अंतिम निर्णय के दौरान उन्हें न तो उचित सूचना दी गई और न ही उनकी उपस्थिति में सुनवाई हुई। यदि शिकायतकर्ता की मौजूदगी के बिना फैसला लिया गया, तो

क्या यह प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ नहीं है?

क्या किसी भी शिकायत का निपटारा बिना शिकायतकर्ता को सुने किया जाना उचित प्रक्रिया कहलाएगा?

मामले से जुड़े पत्रों में साफ उल्लेख है कि शिकायत, जांच और नोटिस की प्रक्रिया चली, लेकिन अंतिम फैसले में शिकायतकर्ता की भूमिका लगभग गायब रही। यही कारण है कि अब पंचायत और प्रशासनिक स्तर पर पारदर्शिता को लेकर सवाल उठ रहे हैं। गांव के लोगों का कहना है कि यदि जांच सही पाई गई थी, तो फिर राहत कैसे मिल गई? और अगर आरोप निराधार थे, तो पहली जांच रिपोर्ट में उन्हें सही क्यों बताया गया?
सहजपाली पंचायत का यह मामला अब सिर्फ एक पंचायत का विवाद नहीं रह गया है, बल्कि यह सवाल बन गया है कि क्या प्रशासनिक जांच और कार्रवाई में दोहरे मापदंड अपनाए जा रहे हैं। शिकायतकर्ता अजय कुमार साहू ने उच्च स्तर पर मामले की पुनः निष्पक्ष जांच की मांग की है और कहा है कि “अगर शिकायतकर्ता को सुने बिना फैसला होगा, तो न्याय का क्या मतलब रह जाएगा?”
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या जिला प्रशासन इस पूरे प्रकरण की दोबारा जांच कराएगा या यह मामला फाइलों में दबकर रह जाएगा। सहजपाली पंचायत में उठे ये सवाल सिर्फ एक गांव के नहीं, बल्कि पूरे पंचायत तंत्र की पारदर्शिता और जवाबदेही की परीक्षा बन चुके हैं।

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