September 27, 2026

“रेत किसकी, नदी किसकी? — सारंगढ़-बिलाईगढ़ में टेंडर से पहले माफिया, कार्रवाई से पहले खामोशी”

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सारंगढ़-बिलाईगढ़ जिले की नदियाँ इन दिनों पानी से ज़्यादा बेबसी और सवालों से भरी हुई हैं। सवाल यह नहीं कि रेत निकाली जा रही है या नहीं, सवाल यह है कि इतनी खुलेआम कैसे? और किसके भरोसे?
दिन में नदी शांत, रात में मशीनें गरजती हैं — मानो अवैध रेत उत्खनन कोई अपराध नहीं, बल्कि सरकारी योजना हो।
अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति, छत्तीसगढ़ द्वारा जिला कलेक्टर सारंगढ़-बिलाईगढ़ को सौंपे गए पत्र ने जिले में चल रहे अवैध रेत उत्खनन के उस “सिस्टम” की ओर इशारा किया है, जिसे सब जानते हैं लेकिन कोई देखता नहीं। पत्र में स्पष्ट उल्लेख है कि जिले की विभिन्न नदियों और नदी तटों पर संगठित तरीके से अवैध रेत उत्खनन किया जा रहा है। यानी यह कोई चोरी-छिपे का काम नहीं, बल्कि पूरी योजना, पूरी व्यवस्था और पूरी निर्भीकता के साथ चल रहा कारोबार है।
व्यंग्य यह है कि जिन क्षेत्रों में टेंडर स्वीकृत नहीं हैं, वहाँ भी रेत निकल रही है और जहाँ टेंडर स्वीकृत हैं, वहाँ रॉयल्टी की शक्ल इतनी पतली है कि फाइलों से बाहर ही नहीं निकल पाती। लगता है रॉयल्टी अब सिर्फ कागज़ों में पैदा होती है और वहीं दम तोड़ देती है।
रात के अंधेरे में भारी वाहनों की कतारें, नियमों को रौंदती मशीनें और सुबह होते ही सब कुछ “सामान्य” — यही सारंगढ़-बिलाईगढ़ का नया रेत मॉडल बन चुका है।
पत्र में चेताया गया है कि इस अवैध उत्खनन से शासन को भारी राजस्व नुकसान हो रहा है, लेकिन उससे भी बड़ा नुकसान पर्यावरण को झेलना पड़ रहा है। नदियों का अस्तित्व संकट में है, जलस्तर तेजी से गिर रहा है और भविष्य में बाढ़, कटाव और जल संकट जैसी समस्याएँ जिले की स्थायी पहचान बन सकती हैं।
लेकिन शायद रेत माफिया भविष्य को ट्रक के हिसाब से देखते हैं — आज की रात, आज की कमाई।
स्थानीय ग्रामीणों में आक्रोश है। नदी उनकी जीवनरेखा है, लेकिन वही नदी उनके सामने लूटी जा रही है। शिकायतें होती हैं, चर्चाएँ होती हैं, लेकिन कार्रवाई हमेशा “जाँच के बाद” वाले कॉलम में अटकी रहती है। प्रशासनिक नियमों का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है, फिर भी जिम्मेदारी किसी की नहीं — यह भी अपने आप में एक कला है।
अखिल भारतीय पत्रकार सुरक्षा समिति ने इस गंभीर विषय पर निष्पक्ष जाँच, दोषी रेत माफियाओं और संबंधित जिम्मेदारों पर सख्त कार्रवाई की मांग की है। साथ ही यह अपेक्षा जताई है कि जिला प्रशासन जनहित और पर्यावरण संरक्षण को प्राथमिकता देते हुए अवैध रेत उत्खनन पर पूर्ण विराम लगाएगा।
अब सवाल सिर्फ इतना है —
क्या यह पत्र फाइलों की शोभा बढ़ाएगा या सच में रेत माफियाओं की नींद उड़ाएगा?
क्योंकि अगर अब भी चुप्पी बनी रही, तो आने वाली पीढ़ियाँ नदियाँ नहीं, सिर्फ खबरों में पढ़ेंगी —
“यहाँ कभी नदी बहती थी…”

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